अध्यक्ष की कलम से

उत्तर भारतीय महासंघ देश की प्रतिनिधि सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक एवं संवैधानिक अधिकारों को प्रदान करने वाला राष्ट्रीय संगठन है।

उत्तर भारतीय महासंघ की स्थापना सन् 1994 में कुछ नौजवानों के प्रयास से हुई। उस समय महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर काफी अन्याय हो रहा था। उनके साथ दुर्व्यवहार हो रहा था, सौतेला बर्ताव हो रहा था। उस समय कई नव युवकों ने इसके खिलाफ आवाज बुलंद की। नव युवकों ने आपस में तय किया कि धीरे - धीरे समाज के लोगों को इकट्ठा कर इस तरह के दुर्वयवहार और सौतेलेपन के खिलाफ आवाज बुलंद करनी चाहिए। तभी महाराष्ट्र में हम अपनी पहचान को बनाए रख सकते हैं। उत्तर प्रदेशीय महासंघ के नाम पर इस संस्था का रजिस्ट्रेशन हुआ। उस समय महाराष्ट्र में जगह - जगह महासंघ की बैठकें और सभाएं आयोजित हुई।

उत्तर भारतीय महासंघ का पहला राष्ट्रीय अधिवेशन मुंबई के इस्माइल यूसुफ कॉलेज ग्राउंड में लगभग डेढ़ लाख लोगों की उपस्थिति में संपन्न हुआ। इस अधिवेशन से महासंघ से जुड़े लोगों का मनोबल बढ़ा और उन्हें आगे चलने और अन्याय के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा मिली। समाज के सभी वर्गों का सहयोग मिला। महासंघ से जुड़े हमारे युवा इससे काफी प्रोत्साहित हुए। महाराष्ट्र मूल के लोगों का भी हमें समर्थन और साथ मिला। इन लोगों ने हमें साथ मिलकर काम करने की प्रेरणा दी। महाराष्ट्र ही नहीं महासंघ ने अब तक देश के कुछ अन्य प्रांतों में भी अपनी पकड़ मजबूत की और उत्तर भारतीयों की अस्मिता की लड़ाई लड़ने का संकल्प लिया।

महासंघ की स्थापना के 25 वर्ष का इतिहास बेहद ही रोमांचकारी और उत्तर भारतीयों की संस्कृति और पहचान की रक्षा में अभूतपूर्व योगदान का रहा है। इसके लिए महासंघ ने कई - कई आंदोलन किए। सरकार और प्रशासन की नींदें उड़ाई, मगर उत्तर भारतीयों की अस्मिता पर आंच तक नहीं आने दी। पच्चीस वर्ष पहले एक छोटे से पौधे के रूप में आकार लेकर महासंघ अब वटवृक्ष का रूप धारण कर चुका है। अनेक याचिकाओं से हमे न्याय मिला।इसकी अनेकानेक शाखाएं और उससे जुड़े लोग इसके विस्तार की कहानी बयां करते हैं। अनेक सफल आंदोलन हुए!महासंघ के अनेकानेक कार्य और अनेक उपलब्धियां रहीं। महाराष्ट्र की धरती पर उत्तर भारतीयों की अस्मिता को अक्षुण्य रखने में महासंघ की महती भूमिका है। महासंघ की स्थापना से पूर्व और बाद में भी उत्तर भारतीयों पर कई - कई बार अन्याय हुए। मगर महासंघ ने सदैव मुखर होकर महाराष्ट्र के तमाम उत्तरभारतीयों की आवाज को बुलंद किया और उन्हें न्याय प्रदान किया है। देखा जाए तो महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों का योगदान अविस्मरणीय है। मगर इन सब के बावजूद महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों को उनकी पहचान नहीं मिल पा रही थी। उत्तर भारतीयों को दूसरे प्रांतों में उनकी पहचान दिलाने और उनकी अस्मिता को बरकरार रखने में महासंघ ने बहुत बड़ा योगदान दिया।

एक लंबी यात्रा महासंघ की रही है। उत्तर भारतीय महासंघ की विभिन्न शाखाएं आज सक्रिय हैं। आईटी विंग, महिला ,फ़िल्म, कामगार ,वाणिज्य विभाग और स्टुडेंट्स विंग भी अपने - अपने स्तर पर कार्य करने में जुटे हैंँ। लोगों का जो प्रतिसाद हम लोगों को मिला और समय - समय पर मिल रहा है, उससे हम सभी को और अधिक कार्य करने की प्रेरणा मिलती है। पिछले 25 वर्षों में महासंघ को कई चुनौतीपूर्ण स्थितियों से गुजरना पड़ा है। हमें बड़ी खुशी है कि मुंबई में स्थापित महासंघ की देश के पांच और राज्यों में राज्य और जिले की इकाइयां बन चुकी हैं। विभिन्न क्षेत्रों में ये लोग बखूबी काम कर रहे हैं।

ऐसे कठिन समय में महासंघ के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने जो कार्य किया है सहयोग दिया और आंदोलन में सदैव सक्रिय रूप से खड़े रहे उन्हें मैं शुभकामनाएं देता हूं कि भविष्य में भी सभी का सहयोग मिलता रहेगा और हम अपनी अस्मिता को बरकरार ऱखते हुए अपनी पहचान को बनाए रखेंगे।

 

शुभकामनाओं सहित

डॉ. योगेश दुबे (राष्ट्रीय अध्यक्ष)