संस्थापक की कलम से

मुंबई शहर पूरे राष्ट्र की आर्थिक राजधानी है यहां के विकास में हम सब का खून पसीना बराबर के हक्क का लगा है तथा विभिन्न क्षेत्र जैसे अध्यापन का हो चाहे भंगार की दुकानें हो आटे की चक्की, कोयले की दुकानें, डेरी फार्म, टेक्सी , रिक्शा और मिल मजदूर फल सब्जी व्यापारी अनचाहे सिक्योरिटी हो सभी में हमारा समाज बहुसंख्यक है और मुंबई के विकास में हमारा योगदान उल्लेखनीय है फिर क्यों हमें दोयम दर्जे के नागरिक के दृष्टिकोण से देखा जाता है यहां अपराधियों को तो सलामी मिल सकती है परंतु सड़कों पर ईमानदारी से फल सब्जी बेचने वालों को पुलिस बेवजह पीटती है महानगर पालिका के कर्मचारी अमानवीय बर्ताव करते हैं हमारे बच्चों को शिक्षा नौकरी या यूं कह लीजिए कि जीवन के हर क्षेत्र में जो मौलिक अधिकार है यह हमें नहीं मिलते |

आज उत्तर भारत की तरफ रेल यात्रा करना अभिशाप बन गया है उत्तर की तरफ जाने वाली ट्रेनें बेहद कम है ट्रेनें विलंब से छूटती है हमें आरक्षण नहीं मिलता आरपीएफ और जीआरपी के कर्मचारी हमारे उत्तर भारतीयों को लूटते हैं पानी बिजली अन्य कोई व्यवस्था नहीं है उत्तर भारत की ओर जाने वाली ट्रेनों में अक्सर पेंट्रीकार नहीं है कर्मचारियों द्वारा यात्रियों को पीटा जाता है अकारण धन मांगा जाता है उत्तर प्रदेश जाने वाली ट्रेनों को कुर्ला से छोड़ा जाता है वहीं अन्य राज्यों की तरफ जाने वाली ट्रेनों में पूरी सुविधा होती है उन्हें सी .एस.टी , दादर से छोड़ा जाता है |

-: विशेष नोट :-

कृपया आप अपने स्तर से भ्रष्टाचार अव्यवस्था व समस्या दूर करने का प्रयास जरुर करें | रेलवे कंपार्टमेंट की गंदगी पानी बिजली अनाधिकृत लोगों द्वारा या पुलिस आर .पी .एफ के द्वारा सताए जाने मारपीट या जबरन पैसा वसूलने की शिकायत लिखित रुप से स्टेशन प्रबंधक के कार्यालय में तुरंत करें तथा वहां तैनात उत्तर भारतीय महासंघ के कार्यकर्ताओं का ध्यान आकर्षित करें साथ ही उत्तर भारतीय महासंघ के मुख्य कार्यालय पर फोन द्वारा संपर्क करें

इन समस्याओं का मूल कारण है सशक्त नेतृत्व का अभाव तथा समाज का संगठित ना होना ऐसा नहीं था कि हम अगुआ विहीन थे और संगठित नहीं थे एक समय कहां 25 -30 वर्ष पूर्व की बातें जहां तक हम जानते हैं हमारे घास बाजार पान की दुकान कुश्ती के अखाड़े दूध मिठाई की दुकानें भंगार व कोयले तथा आटा चक्कियां यह सभी हमारी अघोषित शाखाएं ही तो थी क्या मजाल थी कि कोई आंख उठा कर देख ले परंतु इन 25-30 वर्षों के दौरान उत्तर प्रदेश में समाज में जो फूट पड़ी उसका खामियाजा हमें मुंबई में भुगतना पड़ा |

याद रखें कि कोई कोम न वीर होती है ना कायर उसका नेता उसे चाहे वीर बना दे या कायर बना दे |

आपसे मात्र प्रार्थना यह है कि भारत में आप जहां भी रहते हो अपनी शाखाएं स्वयं खोलिए और आपस में हर वार्ड इकट्ठा होकर अपना नेता स्वयं चुनकर दैनिक कठिनाइयों से लड़ने हेतु संघर्ष करें उत्तर भारतीय महासंघ आपको मार्गदर्शन करने हेतु कृतसंकल्प है आप सभी चाहे जिस कार्य में लगे हों ,चाहे अध्यापन के कार्य में हो , दूध के व्यापार फल-सब्जी, टेक्सी , रिक्शा , कोयला ,चक्की ,भंगार ,नौकरी सिक्योरिटी सभी में अपनी यूनियन स्थानीय स्तर पर बनाएं और उसके नेता स्वयं बने अपनी शाखाओं कार्यालयों में मिल बैठकर अपनी समस्याओं का हल करें इस तरह पुन : अपने स्वाभिमान व सम्मान को प्राप्त करें आप चाहे कहीं भी हो महासंघ के आंदोलन में सक्रिय रुप से भाग लेकर कार्यक्रम सफल बनाएं

उत्तर भारतीय महासंघ के सदस्य बने और अपने समाज को मजबूत करें |

उत्तर भारतीय महासंघ के ज्वलंत विचारों के ध्वजवाहक बनने हेतु महासंघ के मुख्य कार्यालय पर अविलंब संपर्क करें |

 

शुभकामनाओं सहित

श्री घनश्याम दुबे (संस्थापक )