सांस्कृतिक विकास

संस्कृति उस दृष्टिकोण को कहते है जिससे कोई समुदाय विशेष जीवन की समस्याओं पर दृष्टि निक्षेप करता है ।
- डा. सम्पूर्णानन्द

संस्कृति क्या है?

किसी समाज की संस्कृति उस समाज विशेष के समग्र रूप का परिचायक है। किसी समाज की संस्कृति उस समाज के सोचने, विचारने, गायन, नृत्य, कार्य करने, खाने-पीने, बोलने, साहित्य, कला एवं वास्तु आदि में परिलक्षित होती है। किसी भी संस्कृति का वर्तमान स्वरूप उस संस्कृति एवं समाज विशेष द्वारा लंबे समय तक अपनायी गयी पद्धतियों का परिणाम होता है।

संस्कृति शब्द का अर्थ है - उत्तम या सुधरी हुई स्थिति। मानव जाति स्वभाव से ही प्रगतिशील है। हमारी सभ्यता और संस्कृति ही हमे अन्य प्राणियों से अलग करते हैं। ऐसे में यह हमारा मौलिक कर्तव्य और उत्तरदायित्व है कि हम अपनी सांस्कतिक विरासत को ना केवल संभालें बल्कि उसे और उन्नत बनाएं।

मनुष्य की सांस्कृतिक प्रगति मानसिक प्रगति की सूचक होती है। जीवन के लिए गेहूं और गुलाब दोनो आवश्यक हैं। हमे सिर्फ अपनी भौतिक परिस्थितियों में सुधार करके ही सन्तुष्ट नहीं हो जाना चाहिए, अपितु अपने मानसिक और सांस्कृतिक स्तर को भी ऊंचा उठाने के लिए सतत प्रयत्नशील रहना चाहिए। हम सिर्फ भोजन से ही नहीं जीते, हमारे पास शरीर के साथ मन और आत्मा भी है। मन और आत्मा तब तक अतृप्त बने रहते हैं जब तक हमारा सांस्कृतिक विकास न हो। मनुष्य स्वभाव से ही जिज्ञासु है। धर्म और दर्शन हमारी इसी जिज्ञासा का परिणाम हैं। संगीत, साहित्य और कला हमारे पूर्ण विकास के परिचायक हैं।

किसी महापुरुष ने साहित्य के बिना देश के अस्तित्व को ही नकार दिया है।

अंधकार है वहाँ जहां आदित्य नही है, मुर्दा है वह देश जहाँ साहित्य नही है।

उत्तर भारत की धरती ने देश को अनेक साहित्यकार एवम कलाकार दिए हैं। उत्तर भारतीय महासंघ हमारे पूर्वजों द्वारा विरासत में मिली हुई संस्कृति पर गौरवान्वित है।व महासंघ अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन देश भर में करवाता रहता है जिससे कि युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति को जाने , पहचाने, प्रेम करे और गर्व करे।